#सरकार की प्राथमिकता क्या हो ? - नर्मदेश्वर मिश्र के विचार#

उम्मीद है दोस्तों भारत चीनी कोरोना के साथ साथ चीनी सैनिकों को भी धूल चटाएगा। पर हमारे राजनीतिक नेतृत्व को गिरती हुई अर्थव्यवस्था और घटते हुए रोजगार के अवसर पर भी ध्यान देने की जरूरत है। मीडिया को भी रिया और कंगना के खबर के अलावा सरकार को गिरती हुई आर्थिक वृद्धि दर , और बेरोज़गारी के समस्या पर सचेत करना चाहिए। भावनात्मक मुद्दे से ज्यादा हमेशा आर्थिक मुद्दों पर मीडिया को ध्यान देना चाहिए किंतु एक दूसरे से आगे बढ़ने और TRP के चक्कर में सारी मीडिया मसालेदार , विवादास्पद , सनसनी फैलाने वाले खबरों पर बल देती हैं । इसका परिणाम होता है कि शिक्षा , आवास, चिकित्सा , किसान ,मजदूर , छात्र ,बेरोज़गारी , औद्योगिकरण , बुनियादी ढांचा का विकास , क्षेत्रीय असुंतलन , जैसे मुद्दे खत्म होते जा रहे हैं । चुनाव भी केवल जातीय समीकरणों , सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और भावनात्मक मुद्दों पर हो जाती है। भ्रष्टाचार , कीमत में वृद्धि , बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर बात तो की जाती है पर आरोप प्रत्यारोप का दौर चल पड़ता है , और नेतागण निकल पड़ते हैं यह साबित करने में की तू बेईमान , मैं ईमानदार।  जमीनी स्तर पर आप किसी भी सरकारी कार्यालय में जाएं जैसा पहले था ,वैसा ही आज भी है , परिवर्तन नहीं के बराबर है। तब आप पूछ सकते हैं कि मोदी जी इतने लोकप्रिय और राहुल उतने नहीं ऐसा क्यों ? इसका प्रमुख कारण है मोदी जी की वाक् शैली जिनके आगे राहुल जी कहीं नहीं ठहरते । दूसरा प्रमुख कारण है कांग्रेस का संगठन बीजेपी के सामने कहीं नहीं टिकता। तीसरा कांग्रेस के लगातार दस वर्ष , मनमोहन जी के समय में पहला पांच वर्ष सही  रहा किंतु अगले पांच वर्षों में मीडिया ने corruption के मुद्दे पर ऐसा माहौल बनाया की कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई 2014 के चुनावों में। एक बार मोदीजी गद्दी तक पहुंचे उन्होंने विदेशी दौरे , पाकिस्तानी मुद्दे, आक्रामक अंदाज में भाषण , हिंदूवादी राष्ट्रवाद (Abrogation of Article 370, Abolition of Triple Talaq, Beginning of Construction of Ayodhya Shriram Temple ), Media Management , Active RSS support , Destroying the image of Rahul Gandhi on Social Media and Mainstream Media Platforms के सहारे  अपोजिशन को लगभग समाप्त कर दिया है। इसका नतीजा यह है कि अर्थव्यवस्था कि दुर्गति और  बेरोज़गारी जैसे मुद्दे आपको मीडिया में नहीं मिलेंगे। 130 करोड़ वाले आबादी , लगभग 33 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाले इस देश में क्या रिया , कंगना ,रावत, सुशांत , विकास दुबे को मीडिया में इतना स्पेस मिलना चाहिए , बिल्कुल नहीं किंतु शायद भारत की जनता को सिर्फ मसालेदार खबरें ही पसंद है तब तो इन
 चैनलों की TRP बढ़ रही है और रोजी ,रोटी, सुरक्षा, विकास, आवास ,चिकित्सा , कृषि, उद्योग , शिक्षा की बात तो मीडिया करती नहीं , विपक्ष कमजोर है , सरकार पर कोई दबाव नहीं ।
राष्ट्र के मजबूती के लिए सबसे जरूरी है आर्थिक मजबूती। सोवियत संघ सामरिक रूप से बहुत मजबूत था फिर भी उसका पतन हुआ क्योंकि आर्थिक रूप से वह कमजोर हो गया।आज चीन अमेरिका के लिए चुनौती बन रहा है क्योंकि आर्थिक रूप से वह आज बहुत सशक्त है । सामरिक दृष्टि से अमेरिका बहुत आगे है चीन से। तो हमारे देश के संस्थाओं को आर्थिक विषयों पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है। चीनी सैनिकों से भारतीय सैनिक ज्यादा ताकतवर हैं फिर भी अगर चीन हमारे लिए चुनौती बना हुआ है तो इसका एकमात्र कारण है कि भारत की आर्थिक तरक्की चीन के मुकाबले में कमजोर रही है। तात्कालिक परिस्थिति में तो भारत जमकर चीन से मुकाबला करे ही किंतु long term में हमारा फोकस होना चाहिए कि कैसे आर्थिक उन्नति में विश्व में भारत का डंका बजे। यह आर्थिक युग है , अगर आपकी अर्थव्यवस्था मजबूत है तो सामरिक रूप से भी आप मजबूत हो जाएंगे। देखो पाकिस्तान भी न्यूक्लियर पॉवर वाला कंट्री है किंतु उसका विश्व विरादरी में कितना बुरा हाल है? जापान के पास न्यूक्लियर bomb नहीं है फिर भी विश्व में उसका कितना सम्मान हैं क्योंकि अगर आपके पास पैसा है तो कोई अस्त्र- शस्त्र  आप खरीद सकते हैं। हम यह कामना करें की हमारे बुद्धिजीवी नेतागण , चिंतक, मीडिया और जनमानस  लोगों के रोजी- रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा,चिकित्सा, सुरक्षा , भाईचारा की बात पर ज्यादा बल दें । माता लक्ष्मी >माता सरस्वती>माता दुर्गा , शायद इस समय विश्व में ऐसा ही है एक आम हिन्दुस्तानी के हिसाब से सोचने पर। Money>Technology>Power.  So need of the hour is to focus on our declining Economy more than anything else.
सारे मित्रों को नमस्कार । जय हिन्द, जय मातृभूमि ।

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